बाल कहानियां
बाल कहानी 1 - सफर की खुशियाँ
रिया और प्रिया दो बहनें थीं। रिया कक्षा आठ और प्रिया कक्षा सात की छात्रा थी। रिया के मुकाबले में प्रिया बहुत चंचल थी। छुट्टियों का दिन था। रिया और प्रिया नानी के घर अभिभावक के साथ जा रही थी। दोनों बहनें बहुत खुश थीं। दोनों को सफर करना बहुत अच्छा लगता था।
बस में चढ़ते ही रिया बस की खिड़की के पास बैठ गयी और प्रिया पिताजी का मोबाइल लेकर तेज आवाज में कार्टून देखने लगी।
आस- पास कुछ बुजुर्ग लोग बैठे थे। उनको तेज़ आवाज़ से दिक्कत हो रही थी, पर वो कुछ कह नहीं पा रहे थे। बस! अपने कान को बन्द करने की कोशिश कर रहे थे।
रिया बुजुर्गों की दिक्कत को महसूस कर रही थी, पर प्रिया कार्टून देखने में गुम थी।
रिया से रहा नहीं गया। उसने अपनी छोटी बहन प्रिया को समझाया।
प्रिया ने रिया की एक न सुनी।
रिया के माता-पिता सारी बातें सुन रहे थे। उन्होनें इधर- उधर गौर करके देखा तो उनको रिया की बातों में सच्चाई दिखी। देर न करते हुए उन्होंने प्रिया के हाथ से मोबाइल लेते हुए प्रिया को प्यार से समझाया। प्रिया को बात समझ में आ गयी। उसने रिया दीदी से माफी माँगी।
रिया ने तुरन्त माफ कर दिया और प्रिया को बस की खिड़की के पास बैठा दिया। प्रिया सफर का मजा लेने लगी।
संस्कार सन्देश-
सफर करते समय हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हमारे शौक की वजह से किसी को कोई दिक्कत तो नहीं हो रही है।
बाल कहानी 2 - दो गरीब भाई
गोपालपुर गाँव में मेला लगा हुआ था। गोपालपुर में रहने वाले बिरजू और भोला नामक दो भाई मेला देखने के लिए तैयार हो गये। दोनों गरीब थे। मेला देखने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। बिरजू ने भोला से कहा, "भोला! हमारे पास तो पैसे ही नहीं हैं। हम मेला कैसे देखेंगे? हम तो वहाँ से कोई खिलौना भी नहीं ले पायेंगे।"
भोला ने कहा, "अरे बिरजू! तू चल.. हम ऐसे ही मेले में घूमेंगे।" दोनों भाई मेले में पहुँच गये। दोपहर को अचानक मेले में तेज आँधी आ गयी। आँधी आने से मेले में अफरा-तफरी मच गयी। दुकानदारों का बाहर लटका हुआ सारा सामान तेज आँधी से इधर-उधर उड़ने लगा। सारे खिलौने इधर-उधर बिखर गये। कुछ लोग आँधी में फैले हुए सामान को चुराने की कोशिश करने लगे। बिरजू और भोला ने देखा तो तुरन्त उस फैले हुए सामान को बटोरकर दुकानदारों को लौटाने लगे और लोगों को सामान उठाने से मना करने लगे।
जब आँधी थम गयी तो दुकानदारों का बहुत- सा सामान गायब था लेकिन बिरजू और भोला ने दुकानदारों का बहुत सारा सामान आँधी से बचाकर उन्हें लौटा दिया था। दुकानदारों ने दोनों को धन्यवाद कहा और खुशी से बोले, "बेटा! तुमने हमारी बहुत मदद की है, नहीं तो हमारा बहुत नुकसान हो जाता। ये लो कुछ खिलौने.. इनसे तुम खेल लेना.. हमें बहुत खुशी होगी।"
बिरजू और भोला बहुत खुश हुए क्योंकि जो खिलौने वह ले ना सके थे। वह उनके हाथों में थे। उन्होंने ईमानदारी का नेक परिचय जो दिया था।
संस्कार सन्देश-
आपदा आने पर हमें उसका अवसर नहीं उठाना चाहिए बल्कि लोगों की मदद करनी चाहिए।
बाल कहानी 3 - संघर्षों से लड़ना
मंगल नाम का एक धनी व्यक्ति था। उसका एक बेटा था। उसका नाम रामू था। वह अपने माता- पिता का लाडला और इकलौता बेटा का था। वह बहुत आलसी था। पढाई पर भी वह ध्यान नहीं देता तथा दोस्तों के साथ घूमता- फिरता रहता था।
एक दिन उसके पापा ने रामू से कहा, "बेटा! अब तुम बडे हो गये हो। ये घूमना- फिरना छोड़ दो और अपनी पढाई पर ध्यान दो। पढाई से ज्ञान प्राप्त होता है। जीवन में वही सफल होता है, जिसके पास ज्ञान होता है।" बहुत समझाने के बाद भी जब वह नहीं माना तो उसके माता- पिता को रामू के भविष्य की चिन्ता होने लगी। आखिर रामू के भविष्य को लेकर उसके माता- पिता ने यह निर्णय लिया कि अब रामू को कुछ साल तक अपने से दूर रखना होगा। तब रामू के पापा उसके गुरू जी ( जो रामू को पढाते थे) के पास जाकर रामू के बारे में बताते हैं और उसके गुरु से कहते कि, "मेरे बेटे की जिम्मेदारी आज से तुम्हारी। मेरे बेटे का भविष्य आप के हाथ में है। मैं जीवन भर आपका आभारी रहूँगा।"
अब रामू अपने गुरु जी के साथ रहने लगा। उसके गुरु जी ने रामू को अच्छे- बुरे का ज्ञान बताया कि जीवन में संघर्षों से कैसे लड़ना है? अब रामू अच्छे से पढाई करने लगा। धीरे- धीरे वह पढाई में रूचि लेने लगा तथा गुरु की आज्ञा का पालन करने लगा। अपनी पढाई पूरी करके जब वह घर लौटा तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए क्योंकि वह बहुत ही संस्कारी और आज्ञाकारी हो गया था। वह अपने से बड़ों का सम्मान एवं माता- पिता की आज्ञा का पालन करता था। वह आगे चलकर एक आदर्श नागरिक के रूप में विख्यात हुआ।
संस्कार सन्देश: -
गुरु ज्ञान मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत है जो हमें जीवन में सच्ची राह दिखाता है।
बाल कहानी 4 - भाई-बहन का प्यार
रेखा अपने छोटे भाई विजय के साथ स्कूल से घर जा रही थी। रास्ते में अमरूद का पेड़ लगा था। विजय ने दीदी से कहा, "रेखा दीदी! मुझे अमरूद खाना है, तोड़ के दो।"
रेखा बोली, "मैं कैसे तोडूँ अमरूद? ये तो बहुत ऊँचाई पर है। मेरा हाथ नहीं पहुँच पा रहा है। घर चलो! माँ से कहकर तुम्हें अमरूद दिला दूँगी।"
"नहीं.. मुझे अभी चाहिए अमरूद और इसी पेड़ के.. वो देखो, जो गुच्छे में है वो वाला अमरूद चाहिए। घर जा कर नहीं मिलेगा। माँ बाजार जायेगी नहीं। वह पिताजी को फोन करके लाने को कहेगी और जब पिताजी रात को घर वापस आयेंगे, तब तक या वो लाना भूल जायेंगे या हम लोग सो जायेंगे। दीदी अभी मुझे इस पेड़ से अमरूद तोड़ के दो। मुझे अभी मन कर रहा है खाने का। देखो न.. कितने सारे अमरूद लगे हैं। मैं ईट मार कर तोड़ लूँ?"
"नहीं भाई! ऐसा न करना। सब लोग आ-जा रहे है। अगर किसी को ईट लग गयी तो माँ बहुत गुस्सा होगी।"
"दीदी! आप ही तोड़कर दो मुझे। अब कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आप पेड़ पर चढ़ने नहीं दे रही हो और ईट मारने से भी मना कर रही हो।"
"ठीक है भाई! मैं कोशिश करती हूँ। पास एक डण्डा पड़ा है। मैं इसी डण्डे की सहायता से अमरुद तोड़ती हूँ।" वह अमरुद तोड़ने की कोशिश करती है।
"ये डण्डा भी पहुँच नहीं रहा है। मैं उचक कर तोड़ती हूँ।"
रेखा थोड़ा पीछे हटी और दौड़कर उचककर अमरूद के पेड़ पर डण्डा दे मारा। अमरूद तो नहीं गिरे, पर रेखा फिसलकर गिर गयी। उसे चोट लग गयी। वह रोने लगी।
विजय ने दीदी को उठाया। किसी तरह दोनों घर पहुँचे। विजय अपनी जिद पर शर्मिन्दा हुआ। उसने अपने किए की माफ़ी माँगी और माँ को सारा सच बता दिया। माँ ने चोट पर मरहम लगाया फिर समझाया और गले से लगाया।
संस्कार सन्देश: -
हमें धैर्य रखना चाहिए। जिद नहीं करना चाहिए।
बाल कहानी 5 - चिड़िया रानी
समर अपनी कक्षा में पढ़ाई कर रहा था। तभी उसका ध्यान कमरे की खिड़की पर गया, जहाँ बहुत-सी चिड़ियों की चीं-चीं की आवाज़ें आ रही थी। तभी समर की टीचर ने उसे टोका और कहा-, "समर! तुम्हारा ध्यान कहाँ है.. तुम पढ़ाई पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हो? जब देखो, इधर-उधर शैतानी में ही तुम्हारा दिमाग लगा रहता है।" यह सुनकर समर बिना कुछ कहे पढ़ाई करने लगा लेकिन कुछ ही समय बाद समर फिर से कक्षा की खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगा। जहाँ से चिड़ियों की चीं-चीं की आवाज़ें आ रही थी। चिड़ियों की आवाज़ें सुनकर समर की टीचर ने जब खिड़की से बाहर देखा तो एक चिड़िया के पैर पेड़ की डाली में फँसे हुए थे। वह चिड़िया काफी झटपटा रही थी और उस पेड़ की डाली से निकालने की कोशिश कर रही थी। परन्तु चिड़िया के पैर पेड़ की डाली में इस तरह फँसे हुए थे कि उसकी सारी कोशिश नाकाम हो रही थी। यह देखकर बहुत-सी चिड़ियाँ उसे निकालने की कोशिश कर रही थीं और चीं-चीं की आवाज़ें निकाल रही थी। जैसे ही टीचर ने देखा तो उसने समर से कहा, "क्या तुम इस चिड़िया को पेड़ की डाली से निकाल सकते हो?" समर ने कहा, "हाँ!" और वह बाहर की तरफ दौड़ के उस पेड़ के पास पहुँच गया एवं उसने पेड़ पर फँसी चिड़िया को निकाल के जमीन पर रख दिया। कुछ ही मिनट में वह चिड़िया खुले आसमान में उड़ने लगी और सभी बच्चे तालियाँ बजाने लगे।
उड़ती हुए चिड़िया को देखकर लगा, जैसे वह अपने पंख फैलाये खुले आसमान में 'धन्यवाद' कर रही हो समर का।
संस्कार सन्देश :-
दूसरों की सहायता करना ही मानव का सच्चा धर्म है।










